शहर के
रिहायशी इलाके से
अलग थलग
ऊँची चारदीवारी के अन्दर
पड़ी थी वह कब्रगाह
समस्या बनकर
जन-जीवन की
शहर की तरफ
हवा के झोंको के साथ-साथ
आती रहती सड़ांध
उन कब्रों से
अनेकों बार डाली गयी मिटटी
फिर भी निकलती रहती
वह तीखी सड़ांध
फिर से खोदी जाती कब्रें
मुर्दे जागे मिलते हर बार
देने लगते बयान
जो कभी दर्ज नहीं होते
पन्नों में
क्षत विक्षत कर
डाल दिए जाते
और भी गहरे खोदकर
पर आती ही रहती
वह सड़ांध
कभी आये नहीं हाकिम
लिए नहीं गए उनके बयान
और वह तीखी सड़ांध
आज भी
वहां से आती है