रविवार, 27 मार्च 2011

उन्मुक्त

सोचता हूँ 
तोड़ दूं 
सारे धागे
हो लूं 
उन्मुक्त
बस डरता हूँ 
कहीं...
पा न लूं 
अबाध गति 
अनियंत्रित

बृहस्पतिवार, 27 जनवरी 2011

सड़ांध

शहर के
रिहायशी इलाके से
अलग थलग
ऊँची चारदीवारी के अन्दर
पड़ी  थी वह कब्रगाह
समस्या बनकर
जन-जीवन की

शहर  की तरफ
हवा के झोंको के साथ-साथ
आती रहती सड़ांध
उन कब्रों से

अनेकों बार डाली गयी मिटटी
फिर  भी निकलती रहती
वह तीखी सड़ांध
फिर से खोदी जाती कब्रें
मुर्दे जागे मिलते हर बार
देने लगते बयान
जो कभी दर्ज नहीं होते
पन्नों में
क्षत विक्षत कर
डाल दिए जाते
और भी गहरे खोदकर
पर आती ही रहती
वह सड़ांध

कभी आये नहीं हाकिम
लिए नहीं गए उनके बयान
और वह तीखी सड़ांध
आज भी
वहां से आती है


शनिवार, 8 जनवरी 2011

घेरे के भीतर

जेड श्रेणी के
सुरक्षा घेरे से
आवाज गूंजती है-
अब देश
सशक्त हाथों में है
और भी सुरक्षित
खुली सड़कें
निरापद हैं
जनता सुनती है...

घेरे के भीतर
फुसफुसाहट होती है-
आगे खतरा है
राजपथ पर
आवाज कांपती है-
वापस चलो,जल्दी
घेरा सिमट जाता है
जनता देखती है...

शुक्रवार, 24 दिसम्बर 2010

समाजवादी

शुरू में
सामूहिक हित की
बातें करते थे
समाजवादी

गांधीवाद ही
पूंजीवाद है
कहते
नहीं थकते थे
समाजवादी

हट नहीं पाया
पूंजीवाद तो
विस्थापित होकर
पूंजीपति बनते गए
समाजवादी

रविवार, 19 सितम्बर 2010

विकास के रास्ते

पहले पगडंडियाँ
कोलतार पीतीं थीं
कहते थे
विकास के रास्ते
खुले हैं
अब
कोलतार
पगडंडियों को
निगल गईं
कहते हैं
विनाश की बारी है

रविवार, 25 अप्रैल 2010

सड़क पर: कुछ दृश्य

           1
नो एंट्री में
घुसने से रोकती
ट्रैफिक पुलिस
मुट्ठी बंद होते ही
बन जाता था रास्ता
          2
नेताजी चले
गांधीगिरी दिखाने
पीछे अंगरक्षक
सशस्त्र
         ३
नो पार्किंग जोन में
खडी थी कार
पीछे लिखा था
भारत सरकार
         ४
मंडी में
शब्जी की
उगाही करती
पुलिस
पहले
गैरकानूनी था

रविवार, 21 मार्च 2010

प्रतिदान

घोड़े सरपट दौड़ते हैं
..और तेज दौड़ते हैं        
गिरकर उठते हैं
फिर कोशिश करते हैं
कुछ गंतव्य तक
पहुंचते हैं
प्रशिक्षित करके
अंत में
गदहों की सेवा में
लगाये जाते हैं

गदहे
घोड़ों को
उपकृत करते हैं
उनकी मादाओं से
सहवास करते हैं
उपरांत
मादाएं
खच्चरो को
जन्म देती हैं